नई दिल्ली। महाशिवरात्रि का नाम सुनते ही मन में ऐसी रात्रि का बोध होता है, जहां अंधकार भय का नहीं, बल्कि गहन साधना और अंतर्मुखी चेतना का प्रतीक बन जाता है। यह वह रात्रि है जहां मौन, शब्दों से अधिक मुखर हो उठता है, और आत्मा शिवत्व की ओर एक शांत, दिव्य यात्रा पर अग्रसर हो जाती है। काल के कपाल पर अंकित वह क्षण अत्यंत विलक्षण था, जब समय ने स्वयं अपने प्रवाह से विराम लिया और अनंत ने साकार होने का संकल्प किया।
महाशिवरात्रि केवल एक तिथि नहीं, बल्कि चेतना की वह अलौकिक संधि है जहां जड़ ने चेतन को पहचान लिया, जहां वैराग्य ने अनुराग का वरण किया, और पुरुष–प्रकृति के महासंयोग ने शून्य को पूर्णता प्रदान की। हिमालय की धवल, तुषार-मंडित शिखाओं पर समाधिस्थ महादेव का जागरण, सती के पुनर्जन्म रूप पार्वती के तप, त्याग और अनन्य प्रतीक्षा का परम सुफल बना। यह कोई लौकिक विवाह नहीं, अपितु महाकाल और महाकाली के उस दिव्य मिलन की आलोकमयी महागाथा है, जिसने सृष्टि को उसका संतुलन, उसका स्पंदन और उसका शाश्वत अर्थ प्रदान किया।
हिमालय की श्वेत निस्तब्धता में कभी-कभी एक ऐसा क्षण उतरता है जब मौन भी मंत्र बन जाता है। वह क्षण समय की सामान्य धारा से परे होता है न दिन, न रात; न आरंभ, न अंत। वही क्षण है महाशिवरात्रि का जब शिव और पार्वती का दिव्य विवाह स्मृति से निकलकर अनुभव में बदल जाता है। यह केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि चेतना और शक्ति के मिलन का महाकाव्य है; वह संगम, जिसमें सृष्टि को संतुलन मिलता है और जीवन को अर्थ। महाशिवरात्रि की रात्रि अंधकार की नहीं, जागरण की रात्रि है। यह वह घड़ी है जब भीतर का शोर थमता है और आत्मा अपनी ही धड़कन सुन पाती है। यही वह रात है जब कैलाश पर दिव्य मंगल गूंजा था और ब्रह्मांड ने देखा था कि प्रेम केवल भाव नहीं, तप और समर्पण की परिणति है।
कैलाश कोई भौगोलिक शिखर भर नहीं; वह अस्तित्व का मेरुदंड है। वहां की बर्फ केवल शीतल नहीं वह शुद्ध है, निर्विकार है। उसी श्वेत शांति में विराजमान हैं शिव ध्यान में लीन, भस्म से विभूषित, जटाओं में गंगा को धारण किए हुए। उनका मौन शून्यता नहीं, सृजन की पूर्वपीठिका है। उनकी तीसरी आंख संहार नहीं, विवेक की ज्वाला है। शिव का वैराग्य पलायन नहीं; वह संसार को व्यापक दृष्टि से देखने की क्षमता है। वे श्मशानवासी हैं, क्योंकि वे मृत्यु को भी जीवन का अंग मानते हैं। वे नीलकंठ हैं, क्योंकि वे विष को पीकर अमृत बांटने का साहस रखते हैं। उनकी उपस्थिति सिखाती है त्याग भय नहीं, शक्ति है; मौन रिक्तता नहीं, संभावना है।
हिमालय की पुत्री पार्वती केवल सौंदर्य की प्रतिमा नहीं वे संकल्प की ज्योति हैं। उनका प्रेम अधीर नहीं; वह धैर्यवान हैं। उन्होंने शिव को पाने के लिए आकर्षण का मार्ग नहीं चुना; उन्होंने आत्मपरिष्कार का मार्ग चुना। कठोर तप, ऋतुओं का प्रहार, वन की नीरवता सबको सहते हुए उन्होंने अपने भीतर की दुर्बलताओं को गलाया और प्रेम को कुंदन बनाया। पार्वती का तप यह उद्घोष करता है कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, योग्यता से मिलता है। उन्होंने सिद्ध किया कि समर्पण कमजोरी नहीं, शक्ति है। उनका सौंदर्य रूप में नहीं, त्याग में झलकता है; उनका तेज आभूषणों में नहीं, आत्मबल में दमकता है।
जब कामदेव ने शिव की समाधि भंग करनी चाही, तब उनका भस्म होना प्रेम के विरुद्ध निर्णय नहीं था; वह प्रेम की शुद्धि का क्षण था। वासना शीघ्र परिणाम चाहती है, प्रेम प्रतीक्षा में परिपक्व होता है। उस दिन ब्रह्मांड ने सीखा कि शिव प्रेम के विरोधी नहीं, उसके रक्षक हैं। वे चाहते हैं कि प्रेम तपकर उज्ज्वल बने क्षणिक आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मिक मिलन तक पहुंचे। पार्वती की साधना इस अग्नि-परीक्षा के बाद और दीप्त हो उठी। उनका धैर्य स्वयं मंत्र बन गया और शिव का मौन, स्वीकृति।
कहते हैं, एक दिन कैलाश की नीरवता में हल्की-सी मुस्कान तैर गई। शिव ने नेत्र खोले और देखा कि यह प्रेम उन्हें बांधने नहीं आया, बल्कि उनके वैराग्य को पूर्णता देने आया है। पार्वती ने शिव को संसार में नहीं खींचा; उन्होंने संसार को शिव के भीतर प्रतिष्ठित कर दिया। यही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है जहां स्वत्व मिटता नहीं, विस्तृत होता है।
विवाह की तैयारी आरंभ हुई पर यह सांसारिक आडंबर का उत्सव नहीं था। हिमालय ने श्वेत वस्त्र धारण किए, दिशाओं ने पुष्पवृष्टि की, देवताओं ने मंगलगान किया। पर शिव की बारात अनोखी थी भूत, प्रेत, गण, औघड़, नाग। यह दृश्य समाज की परंपरागत दृष्टि को चुनौती देता है। शिव सबको स्वीकार करते हैं सुंदर को भी, विकृत को भी। उनके लिए किसी का बाह्य रूप निर्णायक नहीं; भाव ही प्रधान है। पार्वती के कुल में क्षणिक आशंका हुई, पर शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह विवाह बाह्य शोभा का नहीं, आंतरिक सत्य का है। जब शिव ने दिव्य रूप धारण किया, तब ब्रह्मांड ने देखा वैराग्य और वैभव विरोधी नहीं, एक ही सत्य के दो आयाम हैं।
विवाह का वह क्षण केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था। वह चेतना और शक्ति का आलिंगन था। शिव ने पार्वती का हाथ थामा और सृष्टि को गति मिली। शक्ति को दिशा मिली; दिशा को ऊर्जा। यह मिलन सिखाता है कि जीवन में न केवल ध्यान चाहिए, न केवल कर्म दोनों का संतुलन ही पूर्णता है। विवाह-मंडप में मंत्र गूंजे, पर उनसे अधिक मुखर था मौन। अग्नि साक्षी बनी और उस अग्नि में अहंकार, संशय, अलगाव सब भस्म हो गए। शेष बचा केवल एकत्व।
विवाह के बाद कैलाश पर एक अद्वितीय गृहस्थी का जन्म हुआ जहां योग और दायित्व साथ-साथ चलते हैं। शिव ध्यानस्थ रहते हैं, पर पार्वती के प्रति सजग भी। पार्वती गृहस्थी संभालती हैं, पर शिव के तप का सम्मान भी करती हैं। यहां प्रेम अधिकार नहीं, आश्रय है; संवाद शब्दों से नहीं, समझ से होता है। यह गृहस्थी आधुनिक समाज को भी संदेश देती है कि संबंध स्वतंत्रता को सीमित नहीं करते, उसे सुरक्षित करते हैं। प्रेम बांधता नहीं, विस्तृत करता है।
शिव-पार्वती का सर्वोच्च दार्शनिक रूप अर्धनारीश्वर है। आधा शिव, आधी पार्वती; पर सत्ता एक। यह रूप उद्घोष करता है कि पूर्णता किसी एक पक्ष में नहीं, समन्वय में है। पुरुष और स्त्री, तर्क और भावना, स्थिरता और गति सब परस्पर पूरक हैं। आज, जब समाज संतुलन और समानता की तलाश में है, यह दर्शन और भी प्रासंगिक हो उठता है। अर्धनारीश्वर केवल प्रतीक नहीं; वह जीवन-दृष्टि है।
महाशिवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शिव कोई दूरस्थ देवता नहीं वे हमारे भीतर का विवेक हैं। पार्वती हमारे भीतर की संकल्प-शक्ति हैं। जब ये दोनों मिलते हैं, तभी जीवन में संतुलन उतरता है। इस रात्रि का उपवास केवल भोजन का नहीं, अहं का है। जागरण केवल नेत्रों का नहीं, चेतना का है। शिवलिंग पर अर्पित जल अहंकार का विसर्जन है; बेलपत्र त्रिगुणों का समर्पण। यदि इस पावन रात्रि में हम थोड़ा मौन साध लें, थोड़ा क्रोध त्याग दें, थोड़ा प्रेम जगा लें तो समझिए, हमारे भीतर भी वह दिव्य विवाह घटित हो गया।
आज का समय त्वरित आकर्षणों का है। संबंध क्षणभंगुर हैं, धैर्य दुर्लभ। ऐसे में शिव-पार्वती का विवाह हमें सिखाता है कि प्रेम केवल पाने की आकांक्षा नहीं है। योग्यता, प्रतीक्षा और सम्मान का नाम है। यह पर्व बताता है कि शक्ति और विवेक का संतुलन ही समाज को स्थायित्व देता है।
जब कैलाश पर उस अलौकिक विवाह की स्मृति जगती है, तो केवल अतीत नहीं गूंजता वर्तमान भी आलोकित होता है। महाशिवरात्रि हमें आमंत्रित करती है कि हम अपने भीतर के शिव को पहचानें, पार्वती को प्रतिष्ठित करें, और द्वैत से अद्वैत की यात्रा करें।ॐ नमः शिवाय यह केवल मंत्र नहीं जीवन की लय है, संतुलन का संगीत है, और प्रेम का शाश्वत आलोक।


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